Tuesday, 3 November 2015

सबसे बड़ा अपमान आज शादी विवाह में हो रहा है



सनातन धर्म का सबसे बड़ा अपमान आज शादी विवाह में हो रहा है
विवाह में तीन साक्षी अनिवार्य माने गए हे. अग्नि- ब्राह्मण और सूर्य.
इनमे से एक भी साक्षी की अनुपस्थिति विवाह को कनिष्ठ सिद्ध करती हे. कर्मकाण्डी आचार्यो को ज्ञात ही होगा...
रात के दो या तीन बजे ..शादी के फेरे लगवाना ......
ऐसा धर्मद्रोही कार्य, केवल पेटपुजारी निर्लज्ज कर सकता हैं ....
पिशाच समय के फेरे लगवाना .....ये कौन से शास्त्र में लिखा हैं ....?
दिन में यज्ञ हो सके, रात में तो वेद मंत्र बोलना भी निषेध है, रात में तो भुत-प्रेत पूजा होती है । 
मुग़ल काल में मुगलों के डर से हिन्दू छुप कर रात में विवाह करते थे, वोही आज भी हो रहा है ।
अब हम गुलाम नहीं तो अपनी असली संस्कृति को अपनाये ।
सिख आज भी दिनमे ही विवाह करते है । 
एक तरफ यज्ञ की पवित्र अग्नि और दूसरी तरफ मॉस मदिरा, ऐसे में कोई निर्लज्ज ब्राह्मण ही यज्ञ करके विवाह संपन करवा सकता है, असली ब्राह्मण तो वहा एक पल न रुके । 
जब ब्राह्मण ही नकली तो विवाह कैसा?
राधे राधे 

हिन्दू धर्म में शामिल किए गए सभी मंत्र



भारत एक ऐसी जगह है जहां मनुष्य से ज्यादा रीति-रिवाज़ों को तवज्जो दी जाती है।
भारतीयों के लिए यह संस्कार उनके जीवन के मार्गदर्शक हैं, जिनका पालन करना हर रूप में आवश्यक है।
संस्कारों की बात हो तो हिन्दू धर्म हमें निर्देशों की लंबी-चौड़ी लिस्ट देता है। इस धर्म में हर एक धार्मिक कार्य को करने के लिए दिशा-निर्देश निर्धारित किए गए हैं। इनका उल्लंघन करना वर्जित है।
किस प्रकार से पूजा करें, पूजा की सामग्री, मंत्रों का सही उच्चारण, इत्यादि ऐसे बिंदु हैं जिन्हें बिना मार्गदर्शन के करना व्यर्थ है।
क्या आप जानते हैं कि हिन्दू धर्म में दिए गए प्रत्येक मंत्रका यदि सही एवं सम्पूर्ण रूप से उच्चारण नहीं किया जाए तो यह निष्फल होते हैं?
फिर आप चाहे उस मंत्र को एक बार या फिर सौ बार या हज़ारों बार क्यों ना पढ़ लें। इसीलिए शास्त्रों में प्रत्येक मंत्र को सही ढंग से पढ़ सकने के लिए दिशा-निर्देश प्रदान किए गए हैं।
हिन्दू धर्म में शामिल किए गए सभी मंत्रों में एक मंत्र काफी पवित्र माना जाता है। इस मंत्र का स्थान उच्च है तथा ऐसी मान्यता है कि इसका उच्चारण केवल पुरुष ही करते हैं।
यह मंत्र है गायत्री मंत्र’, जिसे ब्रह्मऋषि विश्वामित्र द्वारा ऋग्वेद में उल्लेखित करवाया गया था। कहा जाता है कि इस मंत्र का विशेषकर उन लोगों द्वारा सबसे ज्यादा जाप किया जाता है जिन्होंने पवित्र जनेऊ धारण कर रखा हो। इस मंत्र के द्वारा वे देवी का आह्वान करते हैं। यह मंत्र सूर्य भगवान को समर्पित है।
गायत्री मंत्र सूर्य भगवान से संबंधित होने के कारण ही ऐसा माना जाता है कि यह मंत्र सूर्योदय और सूर्यास्त के समय पढ़ा जाना चाहिए। ऐसा करने से अधिक लाभ होता है। इसके अलावा यह मंत्र जेनऊ धारण करते समय भी पढ़ा जाता है।
गायत्री मंत्र की मूल परिभाषा के अलावा इस मंत्र से संबंधित कुछ ऐसे तथ्य भी हैं जो काफी कम लोग जानते हैं।
इनमें से एक है स्त्रियों का पवित्र गायत्री मंत्रना पढ़ना।
हिन्दू शास्त्रों के अनुसार स्त्रियां गायत्री मंत्र का जाप नहीं कर सकतीं।
शास्त्रों के अनुसार गायत्री मंत्र के शब्द मानवीय शरीर के तीन चक्रों पर प्रभाव डालते हैं।
ये हैं मूलाधार, स्वाधिष्ठान और मणिपुर। इन चक्रों पर गायत्री मंत्र का प्रभाव होता है।
चिकित्सकीय भाषा में मानवीय शरीर में दो प्रकार के अंग होते हैं जिसमें से एक पिट्यूट्री होता है जो दिमाग में होता है और दूसरा प्रोस्टेट होता है जो जननांग के समीप होता है। जैसे-जैसे शिशु का विकास होता है, उसी प्रकार से लड़के और लड़की के विभिन्न हार्मोन जन्म लेते हैं। इन हार्मोन्स का व्यवहार पुरुष तथा स्त्रियों में अलग-अलग होता है इसीलिए दोनों का शारीरिक आकार भी अलग होता है।
माना गया है कि यदि एक स्त्री रोजाना गायत्री मंत्र का जाप करेगी तो वह एक पुरुष की तरह व्यवहार करने लगती है। इतना ही नहीं, इसका असर उसके शारीरिक अंगों तथा त्वचा पर भी आता है। मुंह पर अनचाहे बाल आने लगते हैं जैसे कि पुरुषों के दाढ़ी के लिए आते हैं। तथा उनके मासिक धर्म में भी दिक्कतें आने लगती हैं।
यदि वह स्त्री गर्भवती है या फिर बच्चे को जन्म दे चुकी है तो उसे दूध आने में भी कठिनाई होती है। दूध का स्राव पहले से काफी कम हो जाता है। कहते हैं कि यदि किसी स्त्री द्वारा काफी ज्यादा समय तक गायत्री मंत्र का जाप किया जाए तो वह ना केवल व्यवहार में बल्कि देखने में भी एक पुरुष की भांति बन सकती है।
उसका शरीर पुरुष की तरह मजबूत मांसपेशियों वाला बन सकता है। इतना ही नहीं, इस मंत्र का बुरा असर उसकी आवाज़ पर भी हो सकता है। उसकी आवाज़ भी एक पुरुष के भांति भारी हो सकती है। इसीलिए गलती से भी स्त्रियों को गायत्री मंत्र का जाप नहीं करना चाहिए।
सभी बताए गए बुरे प्रभाव एक पल में ही नहीं होते। बल्कि इन्हें अपना बदलाव दिखाने में काफी समय लगता है।

सावधान -गायत्री मन्त्र वेद का मन्त्र है।



वेद के मन्त्र को सही विधि से सही उच्चारण के द्वारा ही प्रयोग करने का विधान है।
वेद-मन्त्र के एक-एक शब्द में ही नहीं, अपितु एक-एक अक्षर में भी एक से अधिक स्वर या मात्राएँ हो सकतीं हैं।
गलत उच्चारण करने से मन्त्र का विपरीत प्रभाव होता है तथा साधक की बहुत हानि हो सकती है।
भारत में इस समय संभवतः सौ लोग भी न होंगे, जो गायत्री मन्त्र का सही-सही उच्चारण कर सकें।
क्यों?
क्योंकि आज के स्कूलों में स्वर और व्यंजनों का सही उच्चारण बताने वाले ही नहीं हैं।
यदि आपको यह वहम है कि आपका उच्चारण सही है, तो शौक से जपिये गायत्री मन्त्र।
लेकिन- उससे आपको मिलेगा क्या?
भगवान् श्रीराम ने शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश देते हुए कहा-
प्रथम भगति संतन कर संगा।
कलियुग में वेद का एक ही मन्त्र सर्वोच्च फलदायी है।
वह है कलियुग महामंत्र 
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।।
यद्यपि कुछ न करने से कुछ न कुछ करते रहना उचित है
फिर भी, सावधान रहिए, कहीं अनजाने में आप किसी खतरे में न पड़ जाएँ।
                  राधे राधे 
The Gayatri Mantra, is from Rig Veda. One must never chant it after sunset. Also, singing it in just any tune as devotional singers are doing nowadays is an absolute no- no.

कहना समझना



महत्पूर्ण यह नहीं की क्या कहा जा रहा है
अपितु
यह अधिक महत्पूर्ण है की क्या समझा जा रहा है
उलटी चाल चली दुनिया में ताते जीव खबराय रे !!
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जयपुर के एक राजा थे नाम नही लेंगे, उनको एक महाभारत की कथा सुनाई गयी
कथा कहने वाले पंडितजी ( ग्रस्ति ) थे पंडित जी ने सोचा राजा बहुत धनवान है और घर मे भी हाथ तंग चल रहा सो राजा के यहाँ से जो दक्षिणा मिलेगी उससे बहुत दिन तक गुजारा चलता रहेगा पंडितजी ने बड़े भाव से महाभारत की कथा कही पोथी वही रख कर आ गए।
राजा ने भी अपने परिवार सहित कथा सुनी पर दक्षिणा के रूप में कुछ दिया नही। कथा कहे हुए महीना बीत गया पर राजा के यहाँ से कोई खबर नही आई
एक दिन ब्राह्मणी ने कहा की राजा के घर आप कथा तो कह आये पर दक्षिणा के रूप में राजा ने कुछ दिया नही और पोथी भी राजा के यहाँ पर ही रख कर आये। ब्राह्मण ने कहा पोथी इसलिए रख आया की जब राजा दक्षिणा के लिए बुलाएंगे तब ले आऊंगा पर , शायद राजा प्रजा के काम- काज में व्यस्त रहते है इसलिए भूल गए होंगे पर आज तुमने याद दिला दिया तो आज राजा के यहाँ मैं खुद ही चला जाता हूँ ,
ब्राह्मण राजा के , राज महल में पहुंचे सबसे पहले राज महल मे , राजकुमारी मिली , राजकुमारी ने पंडितजी को प्रणाम किया और कहा पंडजी आपने बहुत कृपा की महाभारत कथा सुना कर आप ने तो हमारी आखँ ही खोल दी पहले सुना दी होती तो हमारा कल्याण हो जाता ,
पंडितजी ने कहा , अच्छा बेटी ! तुमने क्या सुना महाभारत की कथा में ?
"बोले पंडीजी ! दाऊजी अपनी बहिन सुबद्रा जी से बहुत प्रेम करते थे पर दाऊजी ने सोचा की अभी मेरी बहिन बहुत भोली है , अधिक स्नेह के कारण उन्होंने विवाह की कोई खास चिंता की नही उसी बीच सुभद्राजी अर्जुन के साथ भाग गयी।
अब हमारे माता पिता भी हमारे विवाह के लिए कोई ख़ास सोच नही रहे है तो अब मैं भी कोई योग्य राजकुमार देख कर उनके साथ भाग जाउंगी।
पंडितजी ने अपना सिर पिटा की हे राम ! इसने पूरी महाभारत कथा से एक यही शिक्षा ली।
पंडित जी आगे बड़े और रानी मिली ,
रानी ने प्रणाम कर के कहा , महारज ! आप पहले कथा कहते तो मेरा तो भाग्य ही बदल जाता पर अब तो बहुत समय निकल गया और मेरी जवानी भी ढल गयी।
पंडित जी बोले अच्छा , रानी जी ! कहो ! आपने महाभारत की कथा से क्या शिक्षा ली ?
"बोले महाराज ! द्रोपदी के पांच पति थे पांच विवाह हुए इसलिए वो पंच कन्या में आ गयी और मैं तो अंधेरे में रह गयी , एक पति से ही संतुष्ट रह गयी।
पंडितजी रानी की बात सुन कर चुप चाप जल्दी जल्दी पाँव उठाने लगे और मुख से राम राम कहते
आगे बड़े और अब राजा का पुत्र राजकुमार मिला।
राजकुमार पंडितजी को प्रणाम करते हुए कहने लगा , पंडितजी ! आपने महाभारत की कथा सुना कर हमारे भाग्य का रास्ता ही खोल दिया ,
पंडित जी " अच्छा ! आपने क्या प्रेरणा ली ?
बोले महारज ! कंस सब तरह से राज गद्दी के योग्य था पर उनके पिता ने उनको नालायक जान कर राज गद्दी, सोप नही रहे थे , तब उसने अपने पिता उग्रसेन को कारागृह में बंध कर अपने बल के आधार पर राज गद्दी पर बैठ गया , अब मैं भी सोच रहा हूँ की कुछ षडियंत्र करके पिता जी को हटा कर मैं भी राज गिद्दी पर विराजित हो जाऊ।
पंडित जी के मन में खिन्नता होने लगी की , अरे ! ये क्या दुस्स प्रभाव पड़ा |
पंडितजी विचार करते करते राज दरबार में पहुंचे जहा राजा विराज रहे थे , राजा ने राज गद्दी से उठ कर पंडितजी का सत्कार करते हुए कहा आईये पंडितजी आपने महाभारत कथा सुना कर हमारा बहुत सारा धन खर्च होने से बचा दिया पंडित जी खिन्न भाव से बोले अच्छा ! महाराज आपने महाभारत की कथा से क्या प्रेरणा ली ?
"बोले महाराज ! आज तक हम बिना सोचे समझे ही अपना धन लुटाते रहे पर जब से महाभारत कथा सुनी तब से हमारी तो बुद्धि ही ठिकाने आ गयी हमारा बहुत सारा धन खर्च होने से बच गया
अच्छा ! वो कैसे ?
 बोले जब  कौरवो की सभा में शांतिदूत बन कर श्री कृष्ण पधारे तब दुर्योधन ने कहा केशव ! बिना उद्ध के एक सुई के ( नोक ) के बराबर भी पांडवो को भूमि देनेवाला नही हूँ , अब पांडवो को कुछ चाहिए तो युद्ध कर ले......।
और अब आप को भी कुछ दक्षिणा चाहिए तो हमसे युद्ध कर लो फिर जो चाहो जो ले जाओ
पंडितजी ने कहा महाराज ! आप हमारी पोती वापिस कर लीजिये
जान बची तो लाखों पाये !
लोट के बुद्धू घर को आये !!
ये हकीकत घटना है जयपुर के राजा की....!
पर उसका परिणाम क्या होता है ये नही विचारते ,
क्या महाभारत ग्रन्थ में यही शिक्षा है? जो अच्छाईओ को छोड़ बुराईयो का संग्रह करे ? जिसे पंचम वेद कहा गया है उस में जीव के कल्याण के सिवाय कुछ है ही नही |
जिसमे से गीता जैसा  शास्त्र  निकला  ? जो समय को साक्षी रख कर भगवान ने प्रत्येक जीव के कल्याण के लिए मुक्ति का मार्ग बताया आज वो ग्रथ घर मे रखने से लोग कतराते है की महाभर जैसा ग्रथ घर में  रखेंगे तो कही हमारे घरमे महाभारत न छिड़ जाये पर फिर भी आज हर परिवार में जंग  छिड़ी हुई है , कही बाप बेटे के बीच तो कहि सास बहु के बीच , कही भाई - भाई के बीच तो कही पति - पत्नी के बीच .. इद्यादि सब जंग में फसे हुए है कोई बचा हुआ नही  है।
 { जय जय श्री राधे}