Saturday, 11 March 2017

एक संत क़ी अमूल्य शिक्षा




1.      स्त्रियों को शिवलिंग, शालग्राम और हनुमानजी का स्पर्श कदापि नहीं करना चाहिए। उनकी पूजा भी नहीं करनी चाहिए। वे शिवलिंग क़ी पूजा न करके शिवमूर्ति क़ी पूजा कर सकती हैं। हाँ, जहाँ प्रेमभाव मुख्य होता है, वहां विधि-निषेध गौण हो जाता है।
2.       स्त्रियों को रूद्राक्ष क़ी माला धारण नहीं करनी चाहिए। वे तुलसी क़ी माला धारण करें।
3.       भगवान् क़ी जय बोलने अथवा किसी बात का समर्थन करने के समय केवल प्रुर्शों को ही अपने हाथ ऊँचें करने चाहिए, स्त्रियों को नहीं।
4.       स्त्री को गायत्री-जप और जनेऊ-धारण करने का अधिकार नहीं है। जनेऊ के बिना ब्रह्मण भी गायत्री-जप नहीं कर सकता है। शरीर मल- मूत्र पैदा करने क़ी मशीन है। उसकी महत्ता को लेकर स्त्रियों को गायत्री-जप का अधिकार देते हैं तो यह अधिकार नहीं, प्रत्युत धिक्कार है। यह कल्याण का रास्ता नहीं है, प्यात्युत केवल अभिमान बढाने के लिये है। कल्याण चाहने वाली स्त्री गायत्री-जप नहीं करेगी। स्त्री के लिये गायत्री-मंत्र का निषेध करके उसका तिरस्कार नहीं किया है, प्रत्युत उसको आफत से चुदाय है। गायत्री-जप से ही कल्याण होता हो- यह बात नहीं है। राम-नाम का जप गायत्री से कम नहीं है। (सबको सामान अधिकार प्राप्त हो जय, सब बराबर हो जाएँ - ऐसी बातें कहने-सुनने में तो बड़ी अच्छी दीखती हैं, पर आचरण में लाकर देखो तो पता लगे! सब गड़बड़ हो जाएगा! मेरी बातें आचरण में ठीक होती है।)
5.       पति के साधु होने पर पत्नी विधवा नहीं होती। अतः उसे सुहाग के चिन्ह नहीं छोड़ने चाहिए।
6.       पुरुष मा के चरणों में मस्तक रखकर प्रणाम करे, पर अन्य सब स्त्रियों को दूर से प्रणाम करे। स्त्री पति के चरण-स्पर्श करे, पर ससुर आदि अन्य पुरुषों को दूर से प्रणाम करे। तात्पर्य है क़ी स्त्री को पति के सिवाय किसी के भी चारण नहीं चूने चाहिए। साधू-संतों को भी दूर से पृथ्वी पर सर टेककर प्रणाम करना चाहिए।
7.       दूध पिलाने वाली स्त्री को पति का संग नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से दूध दूषित हो जाता है, जिसे पीने से बच्चा बीमार हो जाता है।
8.       कुत्ता अपनी तरफ भौंकता हो तो दोनों हाटों क़ी मुठ्ठी बंद कर लें। कुछ देर में वह चुप हो जाएगा।
9.       मुसलमान लोग पेशाब को बहुत ज्यादा अशुद्ध मानते हैं। अतः गोमूत्र पीने अथवा छिड़कने से मुस्लिम तंत्र का प्रभाव कट जाता है।
10.   कहीं स्वर्ण पडा हुआ मिल जाय तो उसे कभी उठाना नहीं चाहिए।
परमश्रद्धेय स्वामी श्रीरामसुखदासजी

एक संत क़ी अमूल्य शिक्षा




1.      पुरुष की बायीं आँख ऊपर से फडके तो शुभ होती है, नीचे से फडके तो अशुभ होती है। कान क़ी तरफ वाला आँख का कोना फडके तो अशुभ होता है और नाक क़ी तरफ्वाला आँख का कोना फडके तो शुभ होता है।
2.       यदि ज्वर हो तो छींक नहीं आती। छींक आ जाय तो समझो ज्वर गया! छींक आना बीमारी के जाने का शुभ शकुन है।
3.       शकुन मंगल अथवा अमंगल - 'कारक' नहीं होते, प्रत्युत मंगल अथवा अमंगल - 'सूचक होते हैं।
4.       'पूर्व' क़ी वायु से रोग बढ़ता है। सर्प आदि का विष भी पूर्व क़ी वायु से बढ़ता है। 'पश्चिम' क़ी वायु नीरोग करने वाली होती है। 'पश्चिम' वरुण का स्थान होने से वारूणी का स्थान भी है। विघुत तरंगे, ज्ञान का प्रवाह 'उत्तर' से आता है। 'दक्षिण' में नरकों का स्थान है। 'आग्नेय' क़ी वायु से गीली जमीन जल्दी सूख जाती है; क्योंकि आगनेय क़ी वायु शुष्क होती है। शुष्क वायु नीरोगता लाती है। 'नैऋत्य' राक्षसों का स्थान है। 'ईशान' कालरहित एवं शंकर का स्थान है। शंकर का अर्थ है - कल्याण करने वाला।
5.       बच्चों को तथा बड़ों को भी नजर लग जाती है. नजर किसी-किसी की ही लगती है, सबकी नहीं. कईयों की दृष्टि में जन्मजात दोष होता है और कई जान-बूझकर भी नजर लगा देते हैं. नजर उतरने के लिये ये उपाय हिं- पहला, साबत लालमिर्च और नमक व्यक्ति के सिर पर घुमाकर अग्नि में जला दें. नजर लगी होगी तो गंध नहीं आयेगी. दूसरा, दाहिने हाथ की मध्यमा-अनामिका अँगुलियों की हथेली की तरफ मोड़कर तर्जनी व कनिष्ठा अँगुलियों को परस्पर मिला लें और बालक के सिर से पैर तक झाड दें. ये दो अंगुलियाँ सबकी नहीं मिलती. तीसरा, जिसकी नजर लगी हो, वह उस बालक को थू-थू-थू कर दे, तो भी नजर उतर जाती है.
6.       नया मकान बनाते समय जीवहिंसा होती है; विभिन्न जीव-जंतुओं की स्वतन्त्रता में, उनके आवागमन में तथा रहने में बाधा लगती है, जो बड़ा पाप है. अतः नए मकान की प्रतिष्ठा का भोजन नहीं करना चाहिए, अन्यथा दोष लगता है.
7.       जहाँ तक हो सके, अपना पहना हुआ वस्त्र दूसरे को नहीं देना चाहिए.
8.        देवी की उपासना करने वाले पुरूष को कभी स्त्री पर क्रोध नहीं करना चाहिए.
9.       कमीज, कुरते आदि में बायाँ भाग (बटन लगाने का फीता आदि) ऊपर नहीं आना चाहिए. हिन्दू-संस्कृति के अनुसार वस्त्र का दायाँ भाग ऊपर आना चाहिए.
10.   मंगल भूमिका पुत्र है; अतः मंगलवार को भूमि नहीं खोदनी चाहिए, अन्यथा अनिष्ट होता है. मंगलवार को वस्त्र नापना, सिलना नहीं चाहिए.
परमश्रद्धेय स्वामी श्रीरामसुखदासजी

एक संत क़ी अमूल्य शिक्षा




1.      नीयत में गड़बड़ी होने से, कामना होने से और विधि में त्रुटी होने से मंत्रोपासक को हानि भी हो सकती है. निष्काम भाव रखने वाले को कभी कोई हानि नहीं हो सकती.
2.       हनुमानचालीसा का पाठ करने से प्रेतात्मा पर हनुमान जी की मार पड़ती है.
3.       कार्यसिद्धि के लिये अपने उपास्यदेव से प्रार्थना करना तो ठीक है, पर उन पर दबाव डालना, उन्हने शपथ या दोहाई देकर कार्य करने के लिये विवश करना, उनसे हाथ करना सर्वथा अनुचित है. उदाहरणार्थ, 'बजरंगबाण' में हनुमानजी पर ऐसा ही अनुचित दबाव डाला गया है; जैसे- 'इन्हें मारू, तोही सपथ राम की.', 'सत्य होहु हरि सपथ पाई कई.', 'जनकसुता-हरि-दास कहावै. ता की सपथ, विलम्ब न लावे..', 'उठ, उठ, चालू, तोही राम दोहाई'. इस तरह दबाव डालने से उपास्य देव प्रसन्न नहीं होते, उलटे नाराज होते हैं, जिसका पता बाद में लगता है. इसलिए मैं 'बजरंगबाण' के पाठ के लिये मना किया करता हूँ. 'बज्रंग्बान' गोस्वामी तुलसीदासजी की रचना नहीं है. वे ऐसी रचना कर ही नहीं सकते.
4.       रामचरितमानस एक प्रासादिक ग्रन्थ है. जिसको केवल वर्णमाला का गया है, वह भी यदि अंगुली रखकर रामायण के एक-दो पाठ कर ले तो उसको पढना आ जायेगा. वह अन्य पुस्तकें भी पढ़ना शुरू कर देगा.
5.       रामायण के एक सौ आठ पाठ करने से भगवान के साथ विशेष संबंध जुड़ता है.
6.       रामायण का नवाह्न-पारायण आरम्भ होने पर सूआ-सूतक हो जाय तो कोई दोष नहीं लगता.
7.       रामायण का पाठ करने से बुद्धि विक्सित होती है. रामायण का नावाह्न पाठ करने वाला विद्यार्थी कभी फेल नहीं होता.
8.       कमरदर्द आदि के कारण कोई लेटकर रामायण का पाठ चाहे तो कर सकता है. भाव का मूल्य है. भाव पाठ में रहना चाहिए, शरीर चाहे जैसे रहे.
9.       पुस्तक उल्टी नहीं रखनी चाहिए. इससे उसका निरादर होता है. सभी वस्तुएँ भगवत्स्वरूप होने से चिन्मय है. अतः किसी की वास्तु का निरादर नहीं करना चाहिए. किसी आदरणीय वास्तु का निरादर करने से वह वास्तु नष्ट हो जाती है. अथवा उसमें विकृति आ जाती है, यह मेरा अनुभव है.                                                                                                                                 
परमश्रद्धेय स्वामी श्रीरामसुखदासजी