1.
एक ही सिद्धांत, एक ही इष्ट एक ही
मंत्र,
एक ही माला, एक ही समय, एक ही आसन, एक ही स्थान हो तो जल्दी सीधी होती है।
2.
कलियुग में कोई अपना उद्दार करना चाहे तो
राम तथा कृष्ण क़ी प्रधानता है ।
3.
औषध से लाभ न तो हो भगवान् को पुकारना
चाहिए। एकांत में बैठकर कातर भाव से, रोकर भगवान् से प्रार्थना करें जो काम औषध
से नहीं होता, वह प्रार्थना से हो जाता है। मन्त्रों में अनुष्ठान में उतनी शक्ति नहीं
है, जितनी
शक्ति प्रार्थना में है। प्रार्थना जपसे भी तेज है।
4.
भक्तों के नाम से भगवान् राजी होते हैं।
शंकर के मन्दिर में घंटाकर्ण आदि का, राम के मन्दिर में हनुमान, शबरी
आदि का नाम लो। शंकर के मन्दिर में रामायण का पाठ करो। राम के मन्दिर में
शिव्तान्दाव, शिवमहिम्न: आदि का पाठ करो। वे राजी हो जायेंगे। हनुमानजी को प्रसन्न
करना हो उन्हें रामायण सुनाओ। रामायण सुनने से वे बड़े राजी होते हैं।
5.
अपने कल्याण क़ी इच्छा हो तो 'पंचमुखी
या वीर हनुमान' क़ी उपासना न करके 'दास हनुमान' क़ी उपासना करनी
चाहिए।
6.
किसी कार्यको करें या न करें - इस विषय
में निर्णय करना हो तो एक दिन अपने इस्ट का खूब भजन-ध्यान, नामजप, कीर्तन
करें। फिर कागज़ क़ी दो पुडिया बनाएं, एक में लिखें 'काम करें' और
दूसरी में लिखें 'काम न करें'। फिर किसी बच्चे से कोई एक पुडिया उठ्वायें और उसे खोलकर पढ़ लें।
7.
किंकर्तव्यविमूढ होने क़ी दशा में चुप, शांत
हो जाएँ और भगवान् को याद करें तो समाधान मिल जाएगा।
8.
कोई काम करना हो तो मन से भगवान् को देखो।
भगवान् प्रसन्न देखें तो वह काम करो और प्रसन्न न देखें तो वह काम मत करो क़ी
भगवान् क़ी आगया नहीं है। एक- दो दिन करोगे तो भान होने लगेगा।
9.
विदेशी लोग दवा पर जोर देते हैं, पर
हम पथ्यपर जोर देते हैं –
पथ्ये सटी गदार्तस्य किमौषधनिषेवणै:।
पथ्येSसति गदर्त्तस्य किमौषधनिषेवणै:।
'पथ्य से रहने पर रोगी व्यक्ति को औषध-सेवन से क्या प्रायोजन ? और पथ्य से न रहने पर रोगी व्यक्ति को औषध - सेवन से क्या प्रायोजन ?'
पथ्ये सटी गदार्तस्य किमौषधनिषेवणै:।
पथ्येSसति गदर्त्तस्य किमौषधनिषेवणै:।
'पथ्य से रहने पर रोगी व्यक्ति को औषध-सेवन से क्या प्रायोजन ? और पथ्य से न रहने पर रोगी व्यक्ति को औषध - सेवन से क्या प्रायोजन ?'
10.
जहाँ
तक हो सके, किसी भी रोग में आपरेशन नहीं करना चाहिए। दवाओं से चिकित्सा करनी चाहिए।
आपरेशन द्वारा कभी न करायें। जो स्त्री चक्की परमश्रद्धेय स्वामी श्रीरामसुखदासजी