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Tuesday, 3 November 2015

राम नाम से ॐ की उत्पत्ति



राम नाम से '' '' और '' क्रमशः ज्ञान वैराग्य व भक्ति के उत्पादक हैं ।
राम नाम से ॐ की उत्पत्ति
राम शब्द की बहुत ही ऊँची श्रेष्ठता है वेदों में ईश्वर का नाम ॐ कहा गया है इसी ॐ में समस्त संसार की सृष्टि प्रच्छन्न है अथार्त ॐ शब्द पर यदि गंभीरता से विचार किया जाए तो इसी के विस्तार और खंड आदि से संसार की समस्त वस्तुओं का प्रादुर्भाव हुआ है सभी इसके रूपांतर मात्र हैं
पार्वतीजी शिवजी से पूछती है जब संसार की सृष्टि ॐ से हुई है, फिर आप ॐ का जप क्यों नहीं करते?
शिवजी कहते है- सारी सृष्टि ॐ से हुई है और राम नाम से ॐ की उत्पत्ति इसलिय में राम नाम का जप करता हु।
ॐ को दूसरे प्रकार ओम से भी लिखते हैं यह रूप(ओम) उक्त ॐ का अक्षरीकृत रूप ही है ।
व्याकरण शास्त्र के द्वारा राम से ओम अथार्त ॐ उत्पन्न होता है ।
संधि के अनुसार ओम का '' अ: के विसर्ग का अक्षरीकृत रूप परिवर्तन मात्र है इस विसर्ग के दो रूप होते हैं । एक तो यह किसी अक्षर की संनिद्धि से ो हो जाता है या फिर र होता है यदि विसर्ग का रूपांतर ो न करके र किया जाए तो अ र म ही ओम का दूसरा रूप हुआ ।
तब इन अक्षरों के विपर्यय से राम स्वतः बन जायेगा अ र म को यदि र अ म ढंग से रखें और र म व्यंजनों को स्वरांत मानें तो राम बन जाता है ।
इस तरह से जब राम ॐ का रूपांतर मात्र है तो फिर राम विधि हरी हर मय भी है ।
राम और ॐ का विपर्यय इस प्रकार है :
राम = र अ म
अ र म
अ : म
अ ो म
ओम
इसी तरह ॐ का
ॐ = ओम
अ ो म
अ र म
र अ म
राम
इस तरह राम = ॐ
इस तरह जैसे ॐ ब्रह्मा,विष्णु व शिव अथार्त विधि,हरि व हर मय है उसी तरह राम भी विधि हरि हर मय है ।
देवो के देव शिवजी भी ॐ का नहीं राम नाम का जप करते है, किन्तु आज जिन्हें ॐ जप का अधिकार नहीं है(शूद्र और स्त्री) केवल अपने अहंकार की पुष्टि के लिए राम नाम को छोड़ कर ॐ का जप करते है । यही अहंकार से ॐ जप करने पर भी विनाश ही होता है ।

एक भाई ने प्रश्न किया है कि हर समय ॐ जपा जा सकता है या नहीं ?



 ॐ वैदिक मन्त्र है; इसलिये इसके जपकी स्त्रियों और शूद्रों के लिये वेद और स्मृतियों में मनाही है। बाकी सबका अधिकार है ही।
कोई-कोई ऐसा भी कहते हैं कि गृहस्थों को ॐ का जप नहीं करना चाहिये। इसका उच्चारण एकान्त, पवित्र देश में करना उत्तम है ही। मन से चाहे जब कर सकते हैं। अपवित्र अवस्था में वाणी के द्वारा उच्च स्वर से ॐ का जप नहीं करना चाहिये। मानसिक जप तो सूतक आदि अशौच में भी किया जा सकता है। उसके लिये तो कोई आपत्ति है ही नहीं।
जिनके लिए इसका निषेध है वे यदि यह समझें कि हमारा कल्याण कैसे होगा ॐ, राम, हरि, गोविन्द-ये सब परमात्मा थे ही शास्त्रीय नाम। किसी का भी उच्चारण करने से एक ही फल मिलता है। यदि का फल अधिक होता है और रामका कम होता, तब तो आपत्ति होती। तुलसीदासजी तो सब नामों से रामनामको ही श्रेष्ठ समझते हैं, किन्तु वास्तव में कोई भी कम-अधिक नहीं है। जिसको जिस नाम से लाभ मिला, उसने उसी की सर्वोपरी प्रशंसा कर दी।
मेरे विचार से तो राम, , कृष्ण, हरि, नारायण-सबके जप का एक ही फल है। इसलिये आपकी जिस नामों में रुचि हो, वही जप सकते हैं। आपको ॐ नाम से जो लाभ होगा, वही स्त्रियों को राम, गोविन्द, कृष्ण नाम के जप से हो सकता है।
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प्रवचन-तिथि ज्येष्ठ शुक्ल 8, संवत् 2001, प्रात:काल, वटवृक्ष, स्वर्गाश्रम।

स्त्रियोंके लिये ॐ नाम लेना मना नहीं है, जप करना ही मना है।



(किसीने लिखा है कि स्त्रियोंको ॐनाम नहिं लेना चाहिये, श्रीस्वामीजी महाराज मना करते थे; परन्तु)
श्रध्देय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजने भगवानका ॐनाम लेनेके लिये मना नहीं किया है।
कृपया बातको ठीक तरहसे समझें।
स्त्रियों और शूद्रोंको ॐ नामका जप इसलिये मना किया गया है कि यह वैदिक-मन्त्र है। वेदका अधिकार जनऊ-संस्कार होनेके बाद ही होता है।
जनेऊ-संस्कारका अधिकार द्विजाती(ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य)मात्रको ही है।
अगर संस्कार नहीं हुआ है तो पण्डितजीका बेटाभी शूद्रतुल्य माना गया है,उनको भी वेदका अधिकार नहीं है।
यथा-
जन्मना जायते शूद्र संस्काराद्द्विज उच्यते.
इसलिये जैसे स्त्रियाँ पतिका नाम नहीं लेती, पतिका नाम अटकता है, ऐसे ॐका नाम अटकता नहीं है।
यह तो भगवानका नाम है, सभीको लेना चाहिये; पर जप उन्हीको करना चाहिये जिन्होने संस्कार करा लिया है।
श्रध्दाभक्तिपूर्वक ॐनामके उच्चारणसे जो लाभ होता है, वही लाभ रामनामके उच्चारणसे भी हो जाता है।
एक बार रामनामका उच्चारण भगवानके दूसरे हजार नामोंके बराबर माना गया है।
एक बार श्रीशंकर भगवान बोले कि हे पार्वती! आओ, भोजन करलें।
तब श्रीपार्वतीजी बोली कि हे प्रभो! मेरे तो श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रंका पाठ करना बाकी है,(आप भोजन करलें,मैं पाठ करके बादमें भोजन कर लूंगी।वे नित्य श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रवाले भगवानके हजार नाम लेकर भोजन करती थीं)।
तब श्रीशंकर भगवान बोले कि
राम राम राम-इस प्रकार मैं तो इस मनोरम राममें ही रमण करता हूँ।
हे सुमुखी पार्वती! यह रामनाम हजार नामोंके समान है।
यथा-
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।
सहस्रनाम तत्तुल्यं राम नाम वरानने॥
                              (पद्मपुराण)
श्रीशंकर भगवानकी यह बात सुनकर श्रीपार्वतीजीने एक बार रामनाम लिया और शंकर भगवानके साथ ही भोजन कर लिया।
पार्वतीजीके हृदयमें रामनाम आदिके प्रेमको देखकर श्रीशंकरजीने उनको अर्ध्दांगमें (आधे अंगमें)धारण कर लिया।
सहसनाम सम सुनि सिव बानी।
जपि जेईं पिय संग भवानी॥
हरषे हेतु हेरि हर हीको।
किय भूषन तिय भूषन तीको॥
(रामचरितमा.१।१९;)
नारदजीको तो भगवानने माँगनेपर यह वरदान ही दे दिया कि रामनाम सबसे श्रेष्ठ होगा-
राम सकल नामन्हते अधिका।
होउ नाथ अघ खगगन बधिका॥
एवमस्तु मुनि सन कहेउ
(रामचरिमा.३।४२;) आदि।
इस प्रकार भगवानके दूसरे
नामोंकी अपेक्षा रामनाम सबसे बढकर है।