Saturday, 11 March 2017

हिन्दुओं में विवाह रात्रि में क्यों होने लगे हैं ?



क्या कभी आपने सोंचा है कि हिन्दुओं में रात्रि को विवाह क्यों होने लगे हैं, जबकि हिन्दुओं में रात में शुभकार्य करना अच्छा नहीं माना जाता है ? रात को देर तक जागना और सुबह को देर तक सोने को, राक्षसी प्रव्रत्ति बताया जाता है. रात में जागने वाले को निशाचर कहते हैं. केवल तंत्र सिद्धि करने वालों को ही रात्री में हवन यज्ञ की अनुमति है.
वैसे भी प्राचीन समय से ही सनातन धर्मी हिन्दू दिन के प्रकाश में ही शुभ कार्य करने के समर्थक रहे है. तब हिन्दुओं में रात की विवाह की परम्परा कैसे पडी ? कभी हम अपने पूर्वजों के सामने यह सवाल क्यों नहीं उठाते हैं या स्वयं इस प्रश्न का हल नहीं खोजते हैं ?
दरअसल भारत में सभी उत्सव एवं संस्कार दिन में ही किये जाते थे. सीता और द्रौपदी का स्वयंवर भी दिन में ही हुआ था. प्राचीन काल से लेकर मुगलों के आने तक भारत में विवाह दिन में ही हुआ करते थे . मुस्लिम पिशाच आक्रमणकारियों के भारत पर हमले करने के बाद ही, हिन्दुओं को अपनी कई प्राचीन परम्पराएं तोड़ने को विवश होना पडा था .
मुस्लिम पिशाच आक्रमणकारियों द्वारा भारत पर अतिक्रमण करने के बाद भारतीयों पर बहुत अत्याचार किये गये. यह आक्रमणकारी पिशाच हिन्दुओं के विवाह के समय वहां पहुचकर लूटपाट मचाते थे. कामुक अकबर के शासन काल में, जब अत्याचार चरमसीमा पर थे, मुग़ल सैनिक हिन्दू लड़कियों को बलपूर्वक उठा लेते थे और उन्हें अपने आकाओं को सौंप देते थे.
भारतीय ज्ञात इतिहास में सबसे पहली बार रात्रि में विवाह सुन्दरी और मुंदरी नाम की दो ब्राह्मण बहनों का हुआ था, जिनकी विवाह दुल्ला भट्टी ने अपने संरक्षण में ब्राह्मण युवकों से कराया था. उस समय दुल्ला भट्टी ने अत्याचार के खिलाफ हथियार उठाये थे. दुल्ला भट्टी ने ऐसी अनेकों लड़कियों को मुगलों से छुडाकर, उनका हिन्दू लड़कों से विवाह कराया |
उसके बाद मुस्लिम आक्रमणकारियों के आतंक से बचने के लिए हिन्दू रात के अँधेरे में विवाह करने लगे. लेकिन रात्रि में विवाह करते समय भी यह ध्यान रखा जाता है कि - नाच -गाना, दावत, जयमाल, आदि भले ही रात्रि में हो जाए लेकिन वैदिक मन्त्रों के साथ फेरे प्रातः पौ फटने के बाद ही हों.
पंजाब से प्रारम्भ हुई परंपरा को पंजाब में ही समाप्त किया गया . फिल्लौर से लेकर काबुल तक महाराजा रंजीत सिंह का राज हो जाने के बाद उनके सेनापति हरीसिंह नलवा ने सनातन वैदिक परम्परा अनुसार दिन में खुले आम विवाह करने और उनको सुरक्षा देने की घोषणा की थी. हरीसिंह नलवा के संरक्षण में हिन्दुओं ने दिनदहाड़े - बैंडबाजे के साथ विवाह शुरू किये.
तब से पंजाब में फिर से दिन में विवाह का प्रचालन शुरू हुआ. पंजाब में अधिकांश विवाह आज भी दिन में ही होते हैं. अन्य राज्य भी धीरे धीरे अपनी जड़ों की ओर लोटने लगे है, हरीसिंह नलवा ने मुसलमान बने हिन्दुओं की घर वापसी कराई, मुसलमानों पर जजिया कर लगाया, हिन्दू धर्म की परम्पराओं को फिर से स्थापित किया , इसीलिए उनको पुष्यमित्र शुंगका अवतार कहा जाता है

Tuesday, 24 January 2017

शौच के नियम


1. मल त्याग करते समय शीघ्रता से श्वास ग्रहण नहीं करनी चाहिये। (ब्रह्मवैवर्तपुराण, ब्रह्म. 26/26)
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2. किसी जलाशय से बारह अथवा सोलह हाथ की दूरी पर मूत्र-त्याग ओर उससे चार गुणा अधिक दूरी पर ही मल-त्याग करना चाहिये।अर्थात इन जल स्रोतों से यथा संभव दूरी पर मल मूत्र का त्याग करें (धर्मसिंधु 3 पू.आहिन्क)
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3. किसी भी वृक्ष की छाया में मल-मूत्र का त्याग कभी न करें। परन्तु अपनी छाया भूमि पर पड़ रही हो तो उसमें मूत्र-त्याग कर सकते हैं। (आपस्तम्बधर्मसूत्र 1/11/30/16-17)
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4. मल-मूत्र का त्याग करते समय ग्रहों, नक्षत्रों, सूर्य, चन्द्र और आकाश की ओर नहीं देखना चाहिये। अपने मल-मूत्र की ओर भी नहीं देखना चाहिये। (देवीभागवत 11/2/15, कूर्मपुराण उ.13/42)
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5. पेड़ की छाया में, कुएँ के पास, नदी या जलाशय में अथवा उनके तट पर, गौशाला में, जोते हुए खेत में, हरी-भरी घास में, पुराने (टूटे-फूटे) देवालय में, चौराहे में, श्मशान में, गोबर पर, जल के भीतर, मार्ग पर, वृक्ष की जड़ के पास, लोगों के घरों के आस-पास, खम्भे के पास, पुल पर, खेल-कूद के मैदान में, मंच (मचान) के नीचे, भस्म (राख) पर, देव मंदिर में या उसके पास, अग्नि या उसके निकट, पर्वत की चोटी पर, बाँबीपर, गड्ढे में, भूसी में, कपाल (ठीकरे या खप्पर) में, बिल में, अंगार (कोयले) पर, और लकड़ी पर मल-मूत्र का त्याग नहीं करना चाहिये। (ब्रह्मवैवर्तपुराण, ब्रह्म. 26/19-24, गरूड़पुराण, आचार. 96/38)
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6. अग्नि, सूर्य, गौ, ब्राह्मण, गुरू, स्त्री,(अर्थात किसी भी व्यक्ति ) चन्द्रमा, आती हुई वायु, जल और देवालय-इनकी ओर मुख करके (इनके सम्मुख) मल-मूत्र का त्याग नहीं करना चाहिये।
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7. जो स्त्री-पुरूष सूर्य, या वायु की ओर मुख करके पेशाब करते हैं, उनकी गर्भ में आयी हुई सन्तान गिर जाती है। (महाभारत, अनु. 125/64-65)
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8. सामने देवताओं का और दाहिने पितरों का निवास रहता हैं, अत: मुख नीचे करके कुल्ले को अपनी बायीं ओर ही फेंकना चाहिये। (व्याघ्रपादस्मृति 200)
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9. दूधवाले तथा काँटेवाले वृक्ष दातुन के लिये पवित्र माने गये हैं। (लघुहारितस्मृति 4/9)
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10. अपामार्ग, बेल, आक, नीम, खैर, गूलर, करंज, अर्जुन, आम, साल, महुआ, कदम्ब, बेर, कनेर, बबूल आदि वृक्षों की दातुन करनी चाहिये। परन्तु पलाश, लिसोड़ा, कपास, धव, कुश, काश, कचनार, तेंदू, शमी, रीठा, बहेड़ा,सहिजन, सेमल आदि वृक्षों की दातुन नहीं करनी चाहिये। (विश्वामित्रस्मृति 1/61-63)
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11. कशाय, तिक्त अथवा कटु रसवाली दातुन आरोग्यकारक होती हैं। (वृद्धहारीतस्मृति 4/24)
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12. महुआ की दातुन से पुत्रलाभ होता हैं। आक की दातुन से नेत्रों को सुख मिलता हैं। बेर की दातुन से प्रवचन की शक्ति प्राप्त होती हैं। बृहती (भटकटैया) की दातुन करने से मनुष्य दुष्टों पर विजय पाता हैं। बेल और खेर की दातुन से ऐश्वर्य की प्राप्ति होती हैं। कदम्ब से रोगों का नाश होता हैं। अतिमुक्तक (कुन्द का एक भेद) से धन का लाभ होता हैं। आटरूशक (अड़ूसा) की दातुन से सर्वत्र गौरव की प्राप्ति होती हैं। जाती (चमेली) की दातुन से जाति में प्रधानता होती हैं। पीपल यश देता हैं। िशरीश की दातुन से सब प्रकार की सम्पत्ति प्राप्त होती हैं। (स्कन्दपुराण, प्रभास. 17/8-12)
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13. कोरी अंगुली से अथवा तर्जनी अंगुली से कभी दातुन नहीं करना चाहिये। कोयला, बालुका, भस्म (राख) नाख़ून, ईंट, ढेला और पत्थर से दातुन नहीं करना चाहिये। ( स्कन्दपुराण, प्रभास. 17/19)
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14. दातुन कनिश्ठका अंगुली के अग्रभाग के समान मोटी, सीधी तथा बारह अंगुल लम्बी होनी चाहिये। (वसिश्ठस्मृति-2, 6/18)
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15. दन्तधावन करने से पहले दातुन को जल से धो लेना चाहिये। दातुन करने के बाद भी उसे पुन: धोकर तथा तोड़कर पवित्र स्थान में फेंक देना चाहिये। (गरूड़पुराण, आचार. 205/50)
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16. सदा पूर्व अथवा उत्तर की ओर मुख करके दन्तधावन करना चाहिये। पश्चिम और दक्षिण की ओर मुख करके दन्तधावन नहीं करना चाहिये। (पद्मपुराण, सृिश्ट 51/125)
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17. प्रतिपदा, षष्टि , अष्टमी, एकादशी, चतुर्दशी, पूर्णिमा और अमावस्या के दिन शरीर पर तेल नहीं लगाना चाहिये। (ब्रह्मवैवर्तपुराण, श्री कृष्ण 75/60)
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18. सिर पर लगाने से बचे हुए तेल को शरीर पर नहीं लगाना चाहिये। (कूर्मपुराण, उ.16/58)
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19. यदि नदी में स्नान कर रहे हो तो जिस ओर से उसकी धारा आती हो, उसी ओर मुँह करके तथा दूसरे जलाशयों में सूर्य की ओर मुँह करके स्नान करना चाहिये। (महाभारत, आश्व.92)
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20. बिना शरीर की थकावट दूर किये और बिना मुख धोये स्नान नहीं करना चाहिये। (चरकसंहिता, सूत्र. 8/11)
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21. सूर्य की धूप से सन्तप्त व्यक्ति यदि तुरन्त (बिना विश्राम किये) स्नान करता हैं तो उसकी दृष्टि मन्द पड़ जाती हैं और सिर में पीड़ा होती हैं। (नीतिवाक्यामृत 25/28)
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22. पूर्ण नग्न होकर कभी स्नान नहीं करना चाहिये। (मनुस्मृति 4/45)
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23. पुरूष को नित्य सिर के ऊपर से स्नान करना चाहिये। सिर को छोड़कर स्नान नहीं करना चाहिये। सिर के ऊपर से स्नान करके ही देवकार्य तथा पितृकार्य करने चाहिये। (वामनपुराण 14/53)

Wednesday, 28 September 2016

श्राद्ध कर्म एकादशी के दिन वर्जित



*Զधे Զधे*
*श्राद्ध कर्म एकादशी के दिन वर्जित*
श्रील जीव गोस्वामी ने अनेक शास्त्रों से उद्धरण दिये हैं जिनमें कहा गया है कि पितरों को एकादशी तिथि को श्राद्ध की आहुतियाँ नहीं दी जानी चाहिए। जब मृत्यु तिथि एकादशी को हो तो श्राद्ध कर्म एकादशी के दिन नहीं, अपितु अगले दिन द्वादशी को करना चाहिए। ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है
*ये कुर्वन्ति महीपाल श्राद्धं चैकादशी-दिने।*
*त्रयस्ते नरकं यान्ति दाता भोक्ता च प्रेरकः॥*
यदि कोई अपने पुरखों की श्राद्ध की आहुतियाँ एकादशी तिथि को देता है, तो श्राद्धकर्ता एवं वे पुरखे जिनके लिए श्राद्ध किया जाता है तथा पुरोहित तीनों नरकगामी होते हैं।
 स्रोत :श्रीमद्-भागवतम्, सप्तम् स्कन्ध(भागवतम् सन्देश)
सौ: श्रीराधारमण दासी परिकर
      *जय गौर हरि*

Sunday, 10 July 2016

रात को तकिए के पास रखें ये सामान,दिलाएगा आपको सुकून और आराम


सुबह की भाग-दौड़ से थका-हारा व्यक्ति जब रात को नींद के आगोश में जाने के लिए बिस्तर पर लेटता है तो उसे नींद नहीं आती, कई बार अनजाना डर सताता है या फिर बुरे सपनों का भय उसकी नींद में खलल पैदा करता है। ज्योतिष, वास्तु और मान्यता के अनुसार कुछ उपाय हैं जो करने से बहुत से लाभ प्राप्त हो सकते हैं।

बुरे सपनों के भय से बचने के लिए तकिए के पास सौंफ की पोटली बनाकर रखें।

शुभ फलों की प्राप्ति के लिए दक्षिण दिशा में सिर और पांव उत्तर दिशा में होने चाहिए।

सोने से पूर्व धार्मिक ग्रंथ और अपने इष्ट का स्मरण करना चाहिए। मान्यता है की जब रात को सोते हैं तो जितने भी श्वास लिए जाते हैं वह प्रभु चरणों में अर्पित हो जाते हैं। रात को नींद खुलने पर भी अपने इष्ट का स्मरण अथवा महामंत्र का जाप करते रहना चाहिए।

तांबे के बर्तन में तकिए के पास पानी भरकर रखें, सुबह किसी पौधे में उसे डाल दें।

तकिए के पास जूते-चप्प्ल, कूड़ेदान अथवा झाड़ू न रखें। इससे नकारात्मकता बढ़ती है।

बाल बांध कर सोएं, तकिए पर बाल बिखेर कर नहीं सोना चाहिए।

सकारात्मक विचारों के साथ नींद के आगोश में जाएं।

तकिये का आवरण साफ एवं स्वच्छ होना चाहिए।

पैर धो कर सोना चाहिए।

बिस्तर साफ करके सोना चाहिए। गंदा बिस्तर नींद में बाधा पैदा करता है और नेगेटिविटी को बढ़ावा देता है।

तकिए के नीचे हनुमान चालीसा अथवा लोहे का चाकू रखकर सोने से डर नहीं लगता।

Sunday, 27 December 2015

गौ माता कृपा केवलम,,,,,,,,


1 गौ माता जीस जगह खडी रहकर आनंद पुर्वक चैन की सांस लेती है। वहा वास्तु दोष समाप्त हो जाते है।

2 गौ माता मे तैतीस कोटी देवी देवताओं का वास है।

3 गौ माता जीस जगह खुशी से रभांने से देवी देवता पुष्प वर्षा करते है।

4 गौ माता के गले मे घंटी जरूर बांधे गाय के गले मे घंटी बजने से गौ आरती होती है।

5 जो व्यक्ति गौ माता की सेवा पुजा करता है। उस पर आने वाली सभी प्रकार की विपदाओं को गौ माता हर लेती है।

6 गौ माता के खुर्र मे नागदेवता का वास होता है। जहा गौ माता विचरण करती है। उस जगह साप बिच्छू नही आते है।

7 गौ माता के गोबर मे लक्ष्मी जी का वास होता है।

8 गौ माता के मुत्र मे गंगाजी का वास होता है।

9 गौ माता के गोबर से बने उपलो का रोजाना घर दुकान मंदिर परिसरो पर धुप करने से वातावरण शुद्ध होता सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।

10 गौ माता के ऐक आख मे सुर्य व दुसरी आख मे चन्द्र देव का वास होता है।

11 गाय इस धरती पर साक्षात देवता है।

12 गौ माता अन्नपूर्णा देवी है कामधेनु है। मनोकामना पूर्ण करने वाली है।

13 गौ माता के दुध मे सुवर्ण तत्व पाया जाता है जो रोगो की क्षमता को कम करता है।

14 गौ माता की पुछ मे हनुमानजी का वास होता है। कीसी व्यक्ति को बुरी नजर हो जाये तो गौ माता की पुछ से झाडा लगाने से नजर उतर जाती है।

15 गौ माता की पीठ पर ऐक उभरा हुआ कुबंड होता है। उस कुबंड मे सुर्य केतु नाडी होती है। रोजाना सुबह आधा घंटा गौ माता की कुबंड हाथ फेरने से रोगो का नाश होता है

16 गौ माता का दुध अमृत है।

17 गौ माता धर्म की धुरी है।
गौ माता के बिना धर्म कि कलपना नही कि जा सकती है।

18 गौ माता जगत जननी है।

19 गौ माता पृथ्वी का रूप है।

20 गौ माता सर्वो देवमयी सर्वोवेदमयी है। गौ माता के बिना देवो वेदो की पुजा अधुरी है।

21 ऐक गौ माता को चारा खिलाने से तैतीस कोटी देवीदेवताओ को भोग लग जाता है।

22 गौ माता से ही मनुष्यो के गौत्र की स्थापना हुई है।

23 गौ माता चौदह रत्नो मे ऐक रत्न है।

24 गौ माता साक्षात मा भवानी का रूप है।

25 गौ माता के पंचगव्य के बिना पुजा पाठ हवन सफल नही होते है।

26 गौ माता के दुध घी मख्खन दही गोबर गोमुत्र से बने पंचगव्य हजारो रोगो की दवा है। इसके सेवन से असाध्य रोग मीट जाते है

27 गौ माता को घर पर रखकर सेवा करने वाला सुखी आध्यात्मिक जीवन जीता है। उनकी अकाल मृत्यु नही होती है।

28 तन मन धन से जो मनुष्य गौ सेवा करता है। वो वैतरणी गौ माता की पुछ पकड कर पार करता है। उन्हें गौलोकधाम मे वास मीलता है। गौ माता के गोबर से इधंन तैयार होता है।

29 गौ माता सभी देवी देवताओं मनुष्यो की आराध्य है इष्ट देव है।

30 साकेत स्वर्ग इन्द्र लोक से भी उच्चा गौ लोक धाम है।

31 गौ माता के बिना संसार की रचना अधुरी है।

32 गौ माता मे दिव्य शक्तिया होने से संसार का संतुलन बना रहता है।

33 गाय माता के गौवंशो से भुमी को जोत कर की गई खेती सर्वश्रेष्ट खेती होती है।

34 गौ माता जीवन भर दुध पिलाने वाली माता है। गौ माता को जननी से भी उच्चा दर्जा दिया गया है।

35 जंहा गौ माता निवास करती है। वह स्थान तिर्थ धाम बन जाता है।

36 गौ माता कि सेवा परिक्रमा करने से सभी तिर्थो के पुण्यो का लाभ मीलता है।

37 जीस व्यक्ति के भाग्य की रेखा सोई हुई हो तो वो व्यक्ति अपनी हथेली मे गुड को रखकर गौ माता को जीभ से चटाये गौ माता की जीभ हथेली पर रखे गुड को चाटने से व्यक्ति की सोई हुई भाग्य रेखा खुल जाती है।

38 गौ माता के चारो चरणो के बीच से निकल कर परिक्रमा करने से इंसान भय मुक्त हो जाता है।

39 गाय माता आनंद पुर्वक सासें लेती है । छोडती है। वहा से नकारात्मक ऊर्जा भाग जाती है। सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति होती है। वातावरण शुद्ध होता है

40 गौ माता के गर्भ से ही महान विद्वान धर्म रक्षक गौ कर्ण जी महाराज पैदा हुए थे।

41 गौ माता की सेवा के लिए ही इस धरा पर देवी देवताओं ने अवतार लीये है।

42 जब गौ माता बछडे को जन्म देती तब पहला दुध बांज स्त्री को पिलाने से उनका बांजपन मीट जाता है।

43 स्वस्थ गौ माता का गौ मुत्र को रोजाना दो तोला सात पट कपडे मे छानकर सेवन करने से सारे रोग मीट जाते है।

44 गौ माता वात्सल्य भरी निगाहों से जीसे भी देखती है। उनके उपर गौकृपा हो जाती है।

45 गाय इस संसार का प्राण है।

46 काली गाय की पुजा करने से नोह ग्रह शांत रहते है। जो मन पुर्वक धर्म के साथ गौ पुजन करता है। उनको शत्रु दोषो से छुटकारा मीलता है।

47 गाय धार्मिक आर्थिक व सांस्कृतिक आध्यात्मिक दृष्टि से सर्वगुण संपन्न है।

48 गाय ऐक चलता फीरता मंदिर है। हमारे सनातन धर्म में तैतिस कोटी देवी देवता है। हम रोजाना तैतीस कोटी देवी देवताओं के मंदिर जा कर उनके दर्शन नही कर सकते पर गौ माता के दर्शन से सभी देवी देवताओं के दर्शन हो जाते है।

49 कोई भी शुभ कार्य अटका हुआ हो बार बार प्रयत्न करने पर भी सफल नही हो रहा हो तो गौ माता के कान मे कहीये रूका हुआ काम बन जायेगा।

50 जो व्यक्ति मोक्ष गौ लोक धाम चाहता हो उसे गौ व्रती बनना चाहिए ।

51 गौ माता सर्व सुखों की दातार है।
"" हे माँ........आप अनंत आपके गुण अनंत इतना मुझमे सामर्थ्य नही की मे आपके गुणो का गान कर सकु माँ........""


जय श्री कृष्णा
राधे राधे